राजस्थानी साहित्य संस्कृति और इतिहास
लेखक :श्री सौभाग्य सिंह जी शेखावत
पुस्तक की प्रस्तावना में डॉ शम्भू सिंह जी मनोहर (रीडर हिंदी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय) पुस्तक और लेखक के बारे में लिखते है।
श्री सौभाग्य सिंह जी शेखावत राजस्थानी साहित्य के उन जाने-माने लेखकों में से हैं,जिनके साहित्य-सृजन की धरा लगभग अर्द्धशताब्दी से अजस्त्र और अबाध गति से मरू-मानस को रसाप्लावित कराती आ रही है । इस दीर्घ कालावधि में इन्होने राजस्थानी साहित्य के प्रायः सभी अंगो और विधाओ को अपनी प्रतिभा से पुरस्कृत और साधनों से समृद्ध किया है । इनमे प्राचीन काव्य ग्रंथो, कवी-ग्रंथावलियो ,बातो,वार्ताओ तथा वीर गीतों के संपादन से लेकर मौलिक निबंध-लेखन,शोध-पत्र,काव्य-रचना,लघु कथाए आदि सभी समाविष्ट है। साथ ही, इन्होने 'राजस्थानी सबद कोस' के पुनर्सम्पादन एवं परिशोधन जैसे कठिन कार्य को सम्पादित कर कोष-निर्माण की दिशा में स्तुल्य योगदान दिया है।
श्री सौभाग्य सिंह जी का यह बहुआयामी व्यक्तित्व परिमाण में ही विपुल नहीं,गुणवत्ता की दृष्टि से भी उत्कृष्ट है। कारन यह इनकी अनवरत साहित्य-साधना एवं गहन शोधानुसंधान का फल है। इनके सहत्राधिक शोध-लेख तथा दर्जनों ग्रन्थ छप चुके है। इनसे राजस्थानी के अनेक ज्ञात-अज्ञात कवियों और लेखकों के जीवनवृत के बारे में तो प्रमाणिक जानकारी मिली ही है,प्राचीन राजस्थानी की अनमोल सम्पदा भी प्रकाश में आई है,जो अद्यावधि अज्ञात और अलब्ध थी। इससे एक ओर राजस्थानी साहित्य के बृहत् इतिहास की आधारभूमि तैयार हुई है,तो दूसरी ओर इनके सम्यक मुल्यांकन का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है,जो राजस्थानी साहित्य को इसके चिर अपेक्षित गौरवमय सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराने में सहायक सिद्ध होगा। ऐसे यशस्वी कृतित्व के धनि श्री सौभाग्य सिंह जी शेखावत की प्रस्तुत कृति,राजस्थानी में लिखित इनके स्फुट लेखों का संग्रह है। जैसा की पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है,इनमे राजस्थानी साहित्य,संस्कृति और इतिहास की त्रिवेणी का सुन्दर संगम हुआ है। साहित्य में चाहे वह किसी भी भाषा में प्रणित क्यों न हो,संस्कृति तो अनिवार्यतः संयुक्त रहती ही है। परन्तु राजस्थानी साहित्य की यह एक मौलिक विशेषता है की सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित इसकी राधारा प्रायः ऐतिहासिक धरातल पर ही प्रवाहित हुई है। दूसरे शब्दों में,पद-पद पर घटित ऐतिहासिक घटनाएँ यहाँ के अधिकांश काव्यों की उपजीव्य रही है तथा उनके चरित्रनायक इनके आलंबन।
यही कारन है की यहाँ शौर्य की एक एक गाथा पर रूपक रचे गए है;वीरता की eक एक घटना पर गीत गूंथे गए हैं तथा उत्सर्ग के एक एक आख्यान पर 'बातों','वार्ताओं' तथा वाचानिकाओं की सृष्टि हुई है। साहित्य और इतिहास का जैसा अविच्छेद गुम्फन , किंवा मणिकांचन संयोग राजस्थानी साहित्य में हुआ है,वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इतिहास ने यहाँ साहित्य को प्रेरणा दी है तो साहित्य ने इतिहास को अमरत्व ! यहाँ तक की इतिहास भी यहाँ काव्यबद्ध होकर ही गृहीत हुआ है। सूर्यमल्ल का 'वंश भास्कर' इसका ज्वलंत दृष्टान्त है,जो काव्य के माध्यम से इतिहास लेखन की हमारी इसी सुदीर्घ परंपरा की अंतिम महान कृति है। अतः राजस्थानी साहित्य के सम्बन्ध में हमें इस मूलभूत सत्य को समझा लेना चाहिए की ऐतिहासिक सन्दर्भ से विच्छिन्न कर यहाँ की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना को कदाचित नहीं समझा जा सकता।
इसी लिए राजस्थानी साहित्य के मर्मज्ञ श्री सौभाग्य सिंह जी शेखावत ने अपनी प्रतुत कृति में राजस्थानी साहित्य,संस्कृति और इतिहास की इस त्रयी को चुना है तथा इससे सम्बद्ध विवध प्रसंगों पर अपनी ललित व प्रांजल शैली में ये मार्मिक लेख प्रतुत किये है,जिनमे विषय-वैविध्य के साथ वर्नंगत सरसता के भी दर्शन होते हैं। राजस्थानी साहित्य मुल्य्धर्मी है। हर देश किंवा प्रान्त के सामान राजस्थान की भी अपनी अक विशिष्ट संस्कृति है; इसके साहित्य की कुछ निजी विशेषताएँ है, जिनकी पहचान उसमे निरुपित जीवनादर्शो तथा सांस्कृतिक मूल्यों के द्वारा होती है। राजस्थान सदा से ही वीरता का पालना और शौर्य की क्रीडास्थली रहा है। अतः यहाँ का अधिकांश साहित्य भी वीरता मूलक है। परन्तु इस वीरता के पीछे जिन उच्चतम आदर्शों एवं उदात्ततम जीवनमूल्यों की प्रेरणा रही है, उसने इस वीरता को एक अनूठी गरिमा और महिमा से मंडित कर दिया है। इनमे मातृभूमि- प्रेम ,स्वामिभक्ति,सरनागत-वस्तलता,वचन-निर्वाह आदि का उल्लेख है,जिनके लिए इस धरती के लालों ने किसी भी त्याग को त्याज्य और मूल्य को मंहगा नहीं समझा है। श्री सौभग्य सिंघजी ने अपने इन लेखों-जैसे 'वचन' 'राखी रो त्यौहार ', 'गणगोर' देवता तेजोजी' आदि में राजस्थानी साहित्य की इस मूल्याध्र्मिता को अत्यंत मार्मिकता के साथ उजागर किया है। साथ ही, ये हमारी सांस्कृतिक महिमा के भी ज्ञापक है। 'क्रिसन -रुक्मंनी री वेळ', 'संत-भगत नामदास' ,नवजागरण रो कवी शंकरदान समोर' आदि लेखों में जहाँ राजस्थान की साहित्यिक चेतना के उत्कर्ष की अभिव्यक्ति है , वहां 'मयूरध्वज गढ़', सिरे गढ़ जैसलमेर आदि लेखों में इन ऐतिहासिक स्थलों से जुडी अतीत की गौरव-गाथाओं का गायन है। तात्पर्य यह है की इन स्फुट लेखों में राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना ,साहित्यिक गरिमा एवं ऐतिहासिक अस्मिता की एक मनोहर झलक एकत्र देखने को मिल जाती है। कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा जैसे उनके संपूर्ण शोदास-कलायुक्त सौंदर्य को समेटे है,वैसे ही एस कृति में राजस्थानी साहित्य,संस्कृति और इतिहास की समन्वित चेतना अपनी अशेष चारुता के साथ प्रतिछायित है।
ऐसी इस अनूठी कृति का में हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ एवं मुझे विश्वास है की साहित्य-जगत में यह उसी सम्मान की अधिकारिणी होगी ,जो इसके यशस्वी लेखक को प्राप्त है।
शम्भु सिंह मनोहर
श्री सवाई सदन ,
जोबनेर बाग़ ,जयपुर-६